सोशल कॉमेडी: मजहबी व्यापार

मूर्खों को समझाने से मूर्खों की दुश्मनी प्राप्त होती है। 
उदाहरण 
मेरे क्षेत्र के एक गांव में गांव बालों ने 40-60 लाख रुपए मंदिर , हवन के लिए दान किए पर विद्यामंदिर (स्कूल/कॉलेज) के लिए 4 लाख भी न जुड़ेंगे मेरे व्यापार में धर्म है । धर्म का धंधा सबको अंधा बना देता है। 

मैं भारतीय संस्कृति का प्रचारक हु। आर्य हु 🇮🇳। 
सामवेदी ब्राह्मण कुल में जन्मा हु। 
अर्थशास्त्र, समाजशास्त्र, युद्धकला,पाककला 
विधिशास्त्र विद्याओं को ग्रहण करके पंडित उपाधि ली (मुंह उठाके पंडित भी नहीं लिखता जैसा गुटकछाप रीलछाप कर रहे आजकल) 
14 साल की उम्र से UHO के द्वारा समाजसेवा पर्यावरण संरक्षण जागरूकता कर रहा हूं। हर शनिवार जागरूकता कार्यक्रम भी करता हूं। धर्म का भी ज्ञान है , संविधान का भी 
पर में अंधविश्वास चाहे वह किसी भी विश्वास का हो 
चाहे वह भारतीय धर्म 🇮🇳 हो या विदेश विश्वास (इस्लाम ईसाई यहूदी) 
अपमान किसी का नहीं किया पर सम्मान केवल सत्य का किया 


मेरे मठ में ध्यान योग जप यज्ञ होता हैं । (2014 से बागेश्वरी पीठ सिमरा देख रहा हूं) 
मजहब का धंधा करने वालों और उनके अंधभक्तों से प्रसन्न 

1 ~पेड़ को काटकर जलाने से पुण्य होता है या पेड़ को लगाने से ?
2~ निर्दोष जीवो को मारने से देवता प्रसन्न होते है या असुर ?
3 ~ स्त्री कामुक नृत्य से मां दुर्गा प्रसन्न होगी या रूष्ट
4~ इनके कार्यों से राजसिक कर्म होर्डिंग, डीजे मनोरंजन हटा दिया जाए तो ये करेंगे? नहीं 



 © सोशल कॉमेडी
अविनाश पाठक 

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